दतिया उप चुनाव घोषित : मचा सियासी घमासान.......

दतिया उप चुनाव घोषित : मचा सियासी घमासान.......

अजय सिंह कुशवाह, संभाग ब्यूरो (ग्वालियर-चंबल): दतिया उपचुनाव का शंखनाद हो चुका है...हालांकि सियासत का दिलचस्प फिल्मी ड्रामा चुनाव की घोषणा से पहले ही शुरू हो चुका था। आम तौर पर ऐसे दृश्य किसी फिल्म या ओटीटी के राजनैतिक मेगा शो के हो सकते हैं किंतु दतिया का चुनावी परिदृश्य किसी फिल्मी ड्रामे को भी पीछे छोड़ चुका है।

यहां उपचुनाव की स्थिति भी कुछ ऐसे ही फिल्मी अंदाज में रची गई है। पिछले आम चुनाव में छह बार के अपराजेय,  प्रदेश के कद्दावर मंत्री के रूप में पार्टी का बड़ा चेहरा नरोत्तम मिश्रा को शिकस्त देकर कांग्रेस के बड़े नेताओं में खुद की गिनती कराने में सफल रहे थे राजेंद्र भारती । लेकिन सहकारी बैंक के एक घोटाले में सजा के तौर पर अपनी विधायकी गंवानी पड़ी। अपनी पिता श्यामजी की अद्वितीय राजनैतिक पाठशाला से राजनीति का ककहरा सीखने वाले एक परिपक्व राजनेता के रूप में स्थापित राजेंद्र भारती एक मामूली से प्रकरण में इस तरह से मात खा जाएंगे ...किसी ने नहीं सोचा होगा....शायद मिश्रा जी को हल्के में ले लिया । अब पार्टी एकजुट (?) होकर न्यायापालिका  की आस में है।हालांकि उनके समर्थक निश्चिंत हैं कि उन्हें न्याय मिल जाएगा किंतु उनके स्वर में परिस्थितियों को लेकर शंकाएं भी हैं ....आखिरकार मीनाक्षी नटराजन का प्रकरण भी तो अभी ताज़ा ही है..! बहरहाल भारती जी कोर्ट के फेर में हैं...आठ जुलाई की उम्मीदें कायम हैं।

पार्टी चाहे कोई भी हो यदि अपने ही पीठ पीछे छुरा लेकर खड़े हों तो दुश्मनों की किसे ज़रूरत...? अपने कद्दावर प्रतिद्वंद्वी को सियासी अखाड़े  में चारों खाने चित्त कर नरोत्तम मिश्रा बेशक एक घाघ राजनेता की अपनी पुरानी छवि को बरकरार रखने में सफल रहे हों,किंतु उपचुनाव को लेकर उनकी मैदानी और मानसिक तैयारी बता रही है कि पिछली हार और 'अपनों ' के दिये ज़ख्मों ने उनकी राजनैतिक सोच को और परिपक्व किया है। प्रदेश की राजनीति में उनके बढ़ते हुए कद ने उनके 'शुभचिंतकों ' की संख्या में अच्छा खासा इजाफा किया है इसलिए यह चुनाव उनके लिए कितना अहम है इसका अंदाजा सहज लगाया जा सकता है। वे उपचुनाव में भाजपा के सुनिश्चित अघोषित प्रत्याशी हैं। समर्थकों के बीच ' दादा ' नाम से प्रसिद्ध पूर्व गृहमंत्री मिश्रा चुनाव को लेकर अतिगंभीर नजर आ रहे हैं। भारी भरकम विरोध और करारी हार के बाद उनके गहरे 'आत्मचिंतन' का परिणाम है कि चुनाव की औपचारिक घोषणा होने से पहले ही वे सबसे संजीदा प्रत्याशी दिख रहे हैं। सोशल साइट्स पर उनकी बयानबाजी और मैदानी कसरत देखने लायक है। वे अपने गड्ढे भरने में बहुत फुर्ती दिखा रहे हैं। बड़े पैमाने पर विभिन्न सामाजिक व राजनैतिक कार्यकर्ताओं का भाजपा प्रवेश हो या कार्यकर्ताओं के जलसे हों, अपने पुत्रों को चुनाव से दूर रखने का निर्णय हो या सार्वनजिक मंच से अपनी भूलों के लिए खुलेआम क्षमा प्रार्थना करना हो, सभी भूमिकाओं में फिलहाल नरोत्तम अव्वल हैं। विरोधी उनके इस बदले हुए व्यवहार हो चुनावी रंग बता रहे हैं, लेकिन मंझे हुए राजनेता को अपनी खामियां- खूबियाँ बखूबी पता होतीं हैं इसलिए भितरघात और विरोध की आंधी के बीच बिना झिझक उनके सधे हुए सियासी कदम बता रहे हैं कि उप को लेकर वे किसी गफ़लत में नहीं हैं....छाछ भी फूंक - फूंक कर पी रहे हैं ।विकास को मुद्दा बनाकर जनता से बात कर रहे हैं और राजेंद्र भारती व उनके पिता के चालीस सालों के विकास का हिसाब पूछ रहे हैं। मंच से वे हुंकार भरने में भी पीछे नहीं हैं-' कहा था कि किनारों पर घर मत बना लेना, मैं लौट कर आऊंगा!' वे अपनी चुनावी बढ़त तो हासिल कर चुके हैं..लेकिन जन मानस को लेकर उनकी व्यग्रता स्पष्ट है।

कांग्रेस फिलहाल न्यायपालिका की आस और प्रत्याशी चयन के दो पाटों के बीच फंसी नज़र आ रही है।कांग्रेस में बारूद की कमी है।देश भर में कांग्रेस की बदहाल स्थिति जगजाहिर है इस पर प्रदेश में  करिश्माई नेतृत्व की कमी,आपसी गुटबाजी और मजबूत विपक्षीय मानसिकता के अभाव में कार्यकर्ताओं का मन बुझा सा है। सरकार को मुद्दों पर घेरने में असफल विपक्ष अक्सर आपसी संघर्षों में ही में घिरा नजर आता है.... सो इस कमी की भरपाई पार्टी यहां भी मुश्किल से ही कर पाएगी। पहले से ही चुनाव में पिछड़ी कांग्रेस, कन्फ्यूज़्ड कार्यकर्ताओं और नेताओं को न्यायालय के फैसले का भी इंतजार है। राहत के अभाव में पार्टी निर्णय करेगी कि प्रत्याशी राजेन्द्र भारती के पुत्र होंगे, घनश्याम सिंह होंगे या अवधेश नायक। दतिया राजघराने के  घनश्याम सिंह जूदेव गंभीर और साफ़सुथरे राजनैतिक व्यक्तित्व के रूप में पहचाने जाते हैं। तीन बार के विधायक  जूदेव को मजबूत दावेदार के तौर पर देखा जा रहा है। वे भी मीडिया में  नरोत्तम पर सीधे हमला बोल रहे हैं। वहीं अवधेश नायक को अपनी पिछली छीछालेदर की सहानुभूति मिलने की उम्मीद होगी। जब उनके मुंह से निवाला छीन लिया गया था। फिर भी वे चुनाव में पार्टी के साथ खड़े रहे तो शायद उनके साथ किए अन्याय की भरपाई की जाए। भाजपा के आंगन में पलेबढ़े और अनुशासन सीखे नायक पार्टी का प्रभावशाली फेस बन सकते हैं। दतिया शहर कांग्रेस अध्यक्ष अजय शुक्ला भी प्रभावी चेहरा हैं। पार्टी के प्रति वफादार और संघर्षशील शुक्ला को अपने सक्रिय छात्र जीवन एवं राजनैतिक वातावरणयुक्त पारवारिक परिवेश  से मिली राजनीति की घुट्टी का लाभ मिल सकता है, नया चेहरा एवं पार्टी में नायक से अधिक सीनियरटी उन्हें मजबूत दावेदार बनाती है।

बहरहाल इस चुनाव का सबसे दिलचस्प पहलू एक तीसरा प्रत्याशी चेहरा दामोदर यादव का है। दामोदर को दतिया जिले की राजनीति में एक असामान्य नेता के  रूप में अब पहचाना जाने लगा है। स्वयं की पार्टी बना कर राजनीति में उतरने वाले दामोदर बाद में कांग्रेस में शामिल हुए फिर भीम आर्मी ज्वॉइन कर बागेश्वर सरकार और कई पीठाधीश्वरों के विरुद्ध निरंतर विवादित बयान देकर चर्चाओं में बने रहे। दामोदर ने जिले की सेवढ़ा विधानसभा सीट से चुनाव लड़कर बड़ा वोट बैंक हासिल कर दतिया की राजनीति में अपनी प्रभावी उपस्थिति दर्ज कराई थी किंतु आक्रामक और मुंहफट शैली के लिए कई बार घिरे हैं। जातिगत वोट और पार्टी के वोट के अलावा वे नरोत्तम मिश्रा के विरोध को अपनी चुनावी पूंजी बता कर जीत का दावा कर रहे हैं...किंतु दामोदर को जातिगत वोट बैंक के लिए अपने सजातीय क्षत्रपों से ही संघर्ष करना पड़ेगा और पार्टी के वोटों में भी बंटवारा होगा। भाषण की विधा में प्रवीण होते जा रहे दामोदर ने एकाएक चुनावों में कूद कर नरोत्तम मिश्रा पर ताबड़तोड़ हल्ला बोल दिया है। वे  अपने भाषणों में नरोत्तम के खिलाफ 'आश्चर्यजनक ' रूप से झन्नाटेदार और तल्ख़ शब्दावली का प्रयोग कर रहे हैं। नरोत्तम ने भी जवाबी बयानबाजी शुरू कर दी है किंतु... पूर्व विधायक राजेंद्र भारती की मानें तो उपचुनाव में कांग्रेस को हराने के लिए  दामोदर, नरोत्तम मिश्रा द्वारा  प्रायोजित हैं। भारती ने दामोदर को सलाह दी है कि वे उनकी (नरोत्तम) बातों में आकर अपने पॉलिटिकल कैरियर की बलि न चढ़ाएं। भारती का ये बयान बिला वजह नहीं माना जा सकता है क्योंकि राजनीतिक विश्लेषकों का भी मानना है कि दामोदर से कांग्रेस को बहुत नुकसान है..तो यहां भी' दादा ' के ही नम्बर बढ़ रहे हैं।

दतिया की चौसर पर घिरे राजा पर सबकी नज़र है। जोड़- तोड़ का बाजार गर्म है। जोरदार बयानबाजी, भाजपा की लगातार बढ़ रही सदस्यता, दालबाटी चूरमा की शानदार गोठें,घरों,गली चौपालों में सजीं अनवरत चुनावी गोष्ठियों का दौर, दतिया की फिजां को रोशन किये हुए है। अपने अपने मोहरे और प्यादों को परखने की चुनौती सामने है। सब कुछ मतदाताओं के हाथ है..जनता सर्वोपरि है,यह सबको पता है इसलिए उसके मन को पढ़ना ही इस चुनाव का सबसे बड़ा टास्क है।

फिलहाल दतिया की सियासत गर्म है जिसकी तपिश जिले से लेकर प्रदेश और देश की राजधानी तक सरगर्मी पैदा कर रही है...यह तो तय है कि दतिया उपचुनाव देखने लायक होने वाला है।

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