नगर निगम स्लॉटर हाउस विवाद में जवाबों की खानापूर्ति, महापौर की भूमिका पर सवाल

नगर निगम स्लॉटर हाउस विवाद में जवाबों की खानापूर्ति, महापौर की भूमिका पर सवाल

भोपाल।  नगर निगम के स्लॉटर हाउस प्रकरण ने अब एक सामान्य प्रशासनिक निर्णय की सीमाएं लांघकर  नैतिक और वैचारिक बहस का रूप ले लिया है। नगर निगम अध्यक्ष किशन सूर्यवंशी द्वारा उठाए गए सवालों के बाद महापौर मालती राय और निगम आयुक्त संस्कृति जैन की ओर से जो स्पष्टीकरण सामने आए हैं, वे न तो तथ्यात्मक रूप से संतोषजनक हैं और न ही जनता के मन में उठ रहे आक्रोश को शांत कर पाए हैं। यह पूरा मामला अब “प्रक्रिया बनाम पारदर्शिता” की बहस से आगे बढ़कर “जवाबदेही बनाम सत्ता-संरक्षण” का प्रतीक बनता जा रहा है। इस विवाद का सबसे संवेदनशील और गंभीर पक्ष महापौर मालती राय की कार्यशैली को लेकर उठ रहे सवाल हैं। शहर में आम चर्चा है कि क्या महापौर स्वयं निर्णय ले रही हैं या फिर उनकी भूमिका केवल फाइलों पर हस्ताक्षर करने तक सीमित होकर रह गई है। यदि वास्तव में निर्णय कहीं और लिए जा रहे हैं और निर्वाचित महापौर केवल औपचारिक मोहर बनकर रह गई हैं, तो यह नगर निगम की स्वायत्तता पर सीधा आघात है। लोकतंत्र में जनप्रतिनिधि की सबसे बड़ी ताकत उसका निर्णय लेने का अधिकार होता है, और यदि वही कमजोर हो जाए तो व्यवस्था खोखली होने लगती है। इसके उलट, नगर निगम परिषद अध्यक्ष किशन सूर्यवंशी की भूमिका इस पूरे प्रकरण में अपेक्षाकृत  मुखर दिखाई देती है। एबीवीपी से राजनीति की शुरुआत कर भाजपा में दो दशक से अधिक समय से सक्रिय सूर्यवंशी की पहचान एक स्वच्छ छवि वाले नेता के रूप में रही है। स्लॉटर हाउस मुद्दे पर परिषद में सवाल उठाकर उन्होंने न केवल अपना संवैधानिक दायित्व निभाया है, बल्कि यह भी स्पष्ट किया है कि सत्ता पक्ष में रहते हुए भी सवाल पूछना अपराध नहीं, बल्कि जिम्मेदारी है। जनता भी यही अपेक्षा करती है कि उसके प्रतिनिधि आंख मूंदकर फैसलों का समर्थन न करें, बल्कि जहां संदेह हो, वहां आवाज उठाएं। मीडिया और विभिन्न हिंदू संगठनों द्वारा गौकशी और अवैध गतिविधियों को लेकर लगातार नए खुलासे किए जा रहे हैं। इसके बावजूद अब तक कोई ठोस और निर्णायक कार्रवाई सामने नहीं आई है। सिर्फ जांच समितियों, प्रक्रियाओं और नियमों का हवाला देकर जिम्मेदारी से बचना अब संभव नहीं दिखता। जनता को आश्वासन नहीं, परिणाम चाहिए। इस पूरे मामले में कई ऐसे सवाल हैं, जिनसे अब और मुंह नहीं मोड़ा जा सकता। प्रतिदिन 1200 जानवरों के वध की अनुमति देने के बदले क्या भारी रकम ली गई? यदि हां, तो यह राशि किसने ली और किसके माध्यम से ली गई? कौन-कौन से एमआईसी मेंबर्स इस लेन-देन में शामिल थे? क्या स्लॉटर हाउस संचालक द्वारा मासिक रूप से मोटी रकम दी जाती थी और अगर दी जाती थी तो वह किन अधिकारियों या जनप्रतिनिधियों तक पहुंचती थी? एक और गंभीर आरोप यह है कि क्या नगर निगम के कर्मचारी रात के समय सड़कों से गायों और अन्य जानवरों को पकड़कर स्लॉटर हाउस तक ले जाते थे? यदि ऐसा हुआ, तो यह किसके निर्देश पर हुआ और किसके संरक्षण में हुआ? यह सवाल सिर्फ प्रशासनिक नहीं, बल्कि सामाजिक और धार्मिक भावनाओं से भी जुड़ा हुआ है। खाद्य सुरक्षा विभाग की भूमिका भी सवालों के घेरे में है। जो विभाग मिठाई की दुकानों और होटलों में कभी भी सैंपल लेने पहुंच जाता है, उसने क्या कभी इस स्लॉटर हाउस या मांस की दुकानों से सैंपल लिए? यदि लिए, तो उनकी रिपोर्ट सार्वजनिक क्यों नहीं की गई? और यदि नहीं लिए गए, तो यह लापरवाही नहीं तो और क्या है? सबसे भयावह आरोप यह है कि क्या जिंदा और मरे हुए जानवरों के मांस को मिलाकर सप्लाई की जाती रही? यदि ऐसा हुआ है, तो यह न केवल कानून का उल्लंघन है, बल्कि जनस्वास्थ्य के साथ सीधा खिलवाड़ है। स्लॉटर हाउस विवाद आज भोपाल की राजनीति और प्रशासन के लिए एक कसौटी बन चुका है। यह तय करेगा कि नगर निगम पारदर्शिता, जवाबदेही और नैतिक साहस के साथ आगे बढ़ता है या फिर सवालों को दबाकर सत्ता की सुविधा को प्राथमिकता देता है। अब समय बयानबाजी का नहीं, बल्कि स्पष्ट जवाब और ठोस कार्रवाई का है। जनता देख रही है, और उसका सब्र तेजी से खत्म हो रहा है।

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