आज बुधवार की शाम श्री दत्त मंदिर के सभागार में स्त्री सखी मंडल और रंग मोहिनी नाट्य संस्था के संयुक्त तत्वावधान में कालिदास की जीवनी पर केंद्रित एक सुंदर लघु नाटिका का मराठी में मंचन हुआ। 'सरस्वतीचा वरद पुत्र' शीर्षक इस नाटिका का लेखन और निर्देशन किया वरिष्ठ रंगकर्मी और निर्देशक ज्योति सावरीकर ने। इस नाटिका की विशेषता यह थी कि इसमें सभी पात्रों की भूमिका महिलाओं ने ही निभाई। उपस्थित दर्शकों ने इस लघु नाटिका की भरपूर सराहना की।

राजकुमारी विद्योत्तमा के स्वयंवर में कोई भी विद्वान उसके प्रश्नों का उत्तर नहीं दे पाया तो इससे अपमानित महसूस कर कुछ विद्वान जानबूझकर किसी महामूर्ख से उसका विवाह करने का षड़यंत्र रचते हैं। उन्हें ऐसा व्यक्ति दिखता है जो जिस वृक्ष की टहनी पर खड़ा है,उसी पर कुल्हाड़ी से वार कर रहा है। वे उसे बहला-फुसलाकर राजकुमारी के सामने पेश करते हैं और कहते हैं कि ये महान विद्वान हैं मगर यह आपके प्रश्नों का उत्तर संकेतों से ही देंगे, क्योंकि इन्होंने मौन धारण किया है। राजकुमारी के हर प्रश्न का उत्तर मंद बुद्धि कुछ ऐसे संकेतों से देता है जो विद्योत्तमा के अपेक्षित उत्तरों से मेल खा जाता है। इस तरह विद्योत्तमा का विवाह काली से हो जाता है। पर जब विवाह की पहली रात इस झूठ का पर्दाफाश होता है तो राजकुमारी उसे बुरी तरह से तिरस्कृत कर महल छोड़ने को कहती हैं।

दुःखी और अपमानित काली को समझ में आता है कि विद्या न होने से ही उसके साथ ऐसा व्यवहार हुआ है। वह काली देवी की कठोर तपस्या करता है और ज्ञान प्राप्ति के लिए भी दिन रात एक करता है। अंततः देवी माँ की कृपा और अपनी साधना से उसे ज्ञान की प्राप्ति होती है। बारह वर्ष बाद उज्जैन के राजा विक्रमादित्य के दरबार में आकर वह अपनी काव्य प्रतिभा और संस्कृत ज्ञान से समूचे दरबार को मंत्रमुग्ध करता है और राजा विक्रमादित्य के नौ रत्नों में स्थान पाता है।तब उसकी पत्नी राजकुमारी को भी अपनी भूल का अहसास होता है और विद्योत्तमा से उसका पुनर्मिलन होता है।
लगभग पैंतीस मिनट की इस नाटिका में कालिदास की भूमिका में शुभदा केतकर,विद्योत्तमा के किरदार में स्मिता पागनीस और राजा विक्रमादित्य के किरदार में रोहिणी शिंगवेकर ने बहुत प्रभावी अभिनय किया। शेष किरदारों में साधना देसाई, श्वेता केंदुरकर, गौरी थत्ते, शैलजा खांडेकर, मनीषा फफुंदकर, वंदना बीड़कर, सोनाली पुणतांबेकर, कल्पना आल्ती आदि ने भी बढ़िया साथ दिया। सूत्रधार के रूप में शोभा भिसे ने कथा को आगे बढ़ाया। ध्वनि प्रभाव सपना अलकरी का था और मुख्य गायिका ज्योति सावरीकर थीं। कुल मिलाकर सभी ने कालिदास के जीवन से जुड़े नाट्य प्रसंगों का बहुत तन्मय होकर आस्वाद लिया।
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