आवक-जावक लिपिक के भरोसे सहायक पंजीयक कार्यालय, हफ्ते भर से पसरा सन्नाटा, जनता परेशान.……

आवक-जावक लिपिक के भरोसे सहायक पंजीयक कार्यालय, हफ्ते भर से पसरा सन्नाटा, जनता परेशान.……

संभागीय कार्यालय, सहायक पंजीयक, फर्म्स एवं संस्थाएं, भोपाल-नर्मदापुरम संभाग में न अधिकारी, न कर्मचारी, बस खुले पड़े हैं दरवाजे और जलती रहती हैं बत्तियां.......

सौरभ शर्मा, भोपाल: पुराना सचिवालय, डी-ब्लाक स्थित सहायक पंजीयक, फर्म्स एवं संस्थाएं के संभागीय कार्यालय में पिछले एक सप्ताह से अधिक समय से न कोई अधिकारी है, न पर्याप्त कर्मचारी। कार्यालय के दरवाजे खुले हैं, पंखे चल रहे हैं, ट्यूबलाइटें जल रही हैं लेकिन कुर्सियां खाली हैं। फाइलों के अंबार लगे हैं, अलमारियां कागजों से ठसाठस भरी हैं, मगर काम करने वाला कोई नहीं।
जब कार्यालय में देखा गया तो पूरे दफ्तर में केवल एक व्यक्ति मौजूद मिले केवल आवक-जावक लिपिक "प्रदीप श्रीवास्तव"। वे अकेले ही कार्यालय की देखरेख कर रहे थे।

जब पूछा गया तो क्या बोले प्रदीप श्रीवास्तव?
श्रीवास्तव ने बताया कि कार्यालय के कुछ कर्मचारियों को मुख्यालय में बुला लिया गया है, जबकि कुछ कर्मचारी बिना किसी सूचना के अनुपस्थित चल रहे हैं। सबसे चिंताजनक बात यह है कि प्रभारी अधिकारी भी इन्हीं अनुपस्थित लोगों में शामिल हैं। उन्होंने बताया कि यह स्थिति एक-दो दिन की नहीं, बल्कि एक सप्ताह से भी अधिक समय से बनी हुई है।

केवल जनता परेशान हो रही है। कार्यालय में काम से आने वाले नागरिक खाली हाथ लौटने को मजबूर हैं। फर्म, सोसाइटी और संस्थाओं के पंजीयन, नवीनीकरण तथा अन्य जरूरी कार्यों के लिए आने वाले लोगों को न तो कोई सुनने वाला मिल रहा है और न ही कोई समाधान। कई लोग कई-कई दिनों से चक्कर काट रहे हैं।

सरकारी संसाधनों की बर्बादी भी जारी है जिसका प्रमाण कार्यालय में बिजली के पंखे और बत्तियां दिनभर बिना किसी उपयोग के चलती रहती हैं। यह सरकारी संसाधनों की खुली बर्बादी का उदाहरण नही है तो क्या है! दफ्तर में रखी फाइलों और पुराने दस्तावेजों की सुरक्षा को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। यह सवाल अब आम जनता ही नहीं, बल्कि प्रशासनिक हलकों में भी उठ रहा है कि मध्यप्रदेश शासन के अधीन एक महत्वपूर्ण पंजीयन कार्यालय इस तरह बिना अधिकारी और बिना स्टाफ के कैसे चल रहा है? प्रभारी अधिकारी का बिना सूचना के अनुपस्थित रहना प्रशासनिक अनुशासनहीनता की गंभीर मिसाल है। इस घोर लापरवाही पर यदि हम सवाल पूछना भी चाहें तो किससे पूछें, पूछने के लिए कोई होना भी तो चाहिए।

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